: जब ज़मीन पत्थर थी, तो दिल मिट्टी बना — 400 पौधों की ये कहानी सिर्फ हरियाली की नहीं, इंसानियत की भी है
Barkat Qureshi / Mon, May 5, 2025 / Post views : 234
जब ज़मीन पत्थर थी, तो दिल मिट्टी बना — 400 पौधों की ये कहानी सिर्फ हरियाली की नहीं, इंसानियत की भी है
संवाददाता: इस्हाक़ गौरी, मुंदी
कुछ कहानियाँ अखबार में छपती हैं, और कुछ दिल में बस जाती हैं।
मुंदी के एक कोने में, जहां धरती बेजान थी, धूप बेहिसाब थी, और उम्मीदें धुंधली थीं, वहां आज 400 पौधे सांस ले रहे हैं।ये सिर्फ पेड़ नहीं हैं — ये किसी का वादा हैं, किसी की मेहनत हैं, और किसी की ममता का प्रतीक हैं।
"एक पेड़ मां के नाम" — जब नाम से आगे बढ़ा काम
प्रदेश भर में शुरू हुई इस योजना ने कई जगह सिर्फ कागज़ों पर दस्तक दी, मगर मुंदी के राखड़ बांध की पथरीली ज़मीन पर यह योजना एक भावना बन गई।
परियोजना से जुड़े चंदन चौहान और प्रदीप चौहान ने जब उस ज़मीन पर पहला गड्ढा खोदा, तो किसी को नहीं पता था कि वो गड्ढा एक बीज का नहीं, एक सपने का घर बनने वाला है।
"सिर्फ लगाना नहीं, निभाना था..."
उन्होंने कहा था
> “हर पौधे को ऐसे पालूंगा, जैसे मां अपने बच्चे को पालती है।
बिना शिकायत के, बिना थके — एक साल तक उन्होंने और उनकी टीम ने हर सुबह पौधों की हालचाल पूछी, उन्हें पानी दिया, खाद दी, छांव दी और सबसे ज़रूरी — अपना दिल दिया।
बंजर ज़मीन में खाद और कम्पोस्ट मिलाई गई।
ट्यूबवेल खुदवाया गया ताकि किसी पौधे की प्यास अधूरी न रहे।
एक माली रखा गया ताकि पौधे अकेले न हों।और अब...अब वो पौधे फल देने लगे हैं।अब वो ज़मीन मुस्कराती है।अब वो गड्ढे हरियाली के गहने बन गए हैं।
और जब वहां से कोई गुज़रता है, तो हवा कान में धीरे से कहती है: "अगर दिल से चाहो, तो पथरीली ज़मीन भी मां बन जाती है
यह खबर नहीं, एक भावना है।
यह पौधारोपण नहीं, पर्यावरण से रिश्तेदारी है।
और यह हरियाली, आने वाले समय की सबसे हरी उम्मीद है।
संवाददाता: इस्हाक़ गौरी, मुंदी
कुछ कहानियाँ अखबार में छपती हैं, और कुछ दिल में बस जाती हैं।
मुंदी के एक कोने में, जहां धरती बेजान थी, धूप बेहिसाब थी, और उम्मीदें धुंधली थीं, वहां आज 400 पौधे सांस ले रहे हैं।ये सिर्फ पेड़ नहीं हैं — ये किसी का वादा हैं, किसी की मेहनत हैं, और किसी की ममता का प्रतीक हैं।
"एक पेड़ मां के नाम" — जब नाम से आगे बढ़ा काम
प्रदेश भर में शुरू हुई इस योजना ने कई जगह सिर्फ कागज़ों पर दस्तक दी, मगर मुंदी के राखड़ बांध की पथरीली ज़मीन पर यह योजना एक भावना बन गई।
परियोजना से जुड़े चंदन चौहान और प्रदीप चौहान ने जब उस ज़मीन पर पहला गड्ढा खोदा, तो किसी को नहीं पता था कि वो गड्ढा एक बीज का नहीं, एक सपने का घर बनने वाला है।
"सिर्फ लगाना नहीं, निभाना था..."
उन्होंने कहा था
> “हर पौधे को ऐसे पालूंगा, जैसे मां अपने बच्चे को पालती है।
बिना शिकायत के, बिना थके — एक साल तक उन्होंने और उनकी टीम ने हर सुबह पौधों की हालचाल पूछी, उन्हें पानी दिया, खाद दी, छांव दी और सबसे ज़रूरी — अपना दिल दिया।
बंजर ज़मीन में खाद और कम्पोस्ट मिलाई गई।
ट्यूबवेल खुदवाया गया ताकि किसी पौधे की प्यास अधूरी न रहे।
एक माली रखा गया ताकि पौधे अकेले न हों।और अब...अब वो पौधे फल देने लगे हैं।अब वो ज़मीन मुस्कराती है।अब वो गड्ढे हरियाली के गहने बन गए हैं।
और जब वहां से कोई गुज़रता है, तो हवा कान में धीरे से कहती है: "अगर दिल से चाहो, तो पथरीली ज़मीन भी मां बन जाती है
यह खबर नहीं, एक भावना है।
यह पौधारोपण नहीं, पर्यावरण से रिश्तेदारी है।
और यह हरियाली, आने वाले समय की सबसे हरी उम्मीद है।विज्ञापन
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