: "जब सड़क पर पड़ी थी बेबसी... तब इंसानियत की आवाज़ बनकर पहुँचे संटू दादा"
Barkat Qureshi / Sat, May 10, 2025 / Post views : 286
"जब सड़क पर पड़ी थी बेबसी... तब इंसानियत की आवाज़ बनकर पहुँचे संटू दादा"
बखरगांव मार्ग पर घायल परिवार को अपनी सेवा-गाड़ी से पुनासा अस्पताल पहुँचाया, समय पर उपचार से बची जान
माँधाता / संवाददाता इस्हाक़ गौरी, मुंदी
आज जब दुनिया तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है, ऐसे समय में कुछ लोग हैं जो दूसरों के लिए थम जाना जानते हैं — और उन्हीं में एक नाम है संटू दादा, जो किसी ओहदे या पद से नहीं, अपने कर्मों से पहचाने जाते हैं।
घटना आज दोपहर की है, जब समाजसेवी संटू दादा अपनी सेवा गाड़ी (.108) से सनावद से अपने ग्राम गुर्जर खेड़ी लौट रहे थे।
जैसे ही वे बखरगांव और हरबंसपुरा के बीच पहुँचे, उनकी नज़र सड़क किनारे पड़े चार घायलों और उनके मासूम बच्चों पर गई — रिछफल गांव के ये लोग दर्द से कराह रहे थे, और आसमान की ओर टकटकी लगाए शायद किसी फ़रिश्ते की राह देख रहे थे।
हजारों वाहन निकले, पर कोई नहीं रुका।
लेकिन संटू दादा रुके —
उन्होंने बिना सोच-विचार के, बिना इंतज़ार के, घायलों को गाड़ी में बिठाया और सीधा पुनासा स्वास्थ्य केंद्र पहुँचे।
डॉ. नरेंद्र चौधरी और उनकी टीम ने तत्काल उपचार किया।
समय पर मिली मदद ने चारों की जान बचा ली।
सेवा... जो आदत नहीं, आत्मा बन गई है
यह कोई पहली घटना नहीं थी।
संटू दादा का यह जीवन-मार्ग वर्षों से इसी सेवा-भावना की राह पर चल रहा है।
चाहे रात का समय हो या दोपहर की तपन, बारिश हो या अंधेरा —
जहाँ ज़रूरत होती है, संटू दादा बिना बुलाए पहुँचे हैं।
ज़ुबान से नहीं, कर्मों से बोलती है उनकी इंसानियत
स्थानीय लोग उन्हें चलती फिरती एंबुलेंस कहते हैं।
एक बार ऐसे ही अवसर पर एक बुजुर्ग कहा: था कि
> "ऐसा बेटा हर गाँव को मिले, तो शायद दर्द की चीख़ें कभी बेसुनी न जाएँ।"
"उसने किसी का धर्म नहीं देखा, न जात — सिर्फ़ ज़ख़्म देखे और मलहम बन गया।"
एक सवाल समाज से भी...
यह घटना हमें आईना दिखाती है —
जब कोई तड़पता है, तो क्या हम भी रुकते हैं?
या हमारी गति हमें इंसान से मशीन बना चुकी है?
संटू दादा का यह क़दम हमें याद दिलाता है कि इंसानियत अभी ज़िंदा है — और जब-जब समाज चुप रहेगा, तब-तब कोई संटू दादा आगे बढ़कर बोलेगा, थामेगा और बचाएगा।
माँधाता / संवाददाता इस्हाक़ गौरी, मुंदी
आज जब दुनिया तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है, ऐसे समय में कुछ लोग हैं जो दूसरों के लिए थम जाना जानते हैं — और उन्हीं में एक नाम है संटू दादा, जो किसी ओहदे या पद से नहीं, अपने कर्मों से पहचाने जाते हैं।
घटना आज दोपहर की है, जब समाजसेवी संटू दादा अपनी सेवा गाड़ी (.108) से सनावद से अपने ग्राम गुर्जर खेड़ी लौट रहे थे।
जैसे ही वे बखरगांव और हरबंसपुरा के बीच पहुँचे, उनकी नज़र सड़क किनारे पड़े चार घायलों और उनके मासूम बच्चों पर गई — रिछफल गांव के ये लोग दर्द से कराह रहे थे, और आसमान की ओर टकटकी लगाए शायद किसी फ़रिश्ते की राह देख रहे थे।
हजारों वाहन निकले, पर कोई नहीं रुका।
लेकिन संटू दादा रुके —
उन्होंने बिना सोच-विचार के, बिना इंतज़ार के, घायलों को गाड़ी में बिठाया और सीधा पुनासा स्वास्थ्य केंद्र पहुँचे।
डॉ. नरेंद्र चौधरी और उनकी टीम ने तत्काल उपचार किया।
समय पर मिली मदद ने चारों की जान बचा ली।
सेवा... जो आदत नहीं, आत्मा बन गई है
यह कोई पहली घटना नहीं थी।
संटू दादा का यह जीवन-मार्ग वर्षों से इसी सेवा-भावना की राह पर चल रहा है।
चाहे रात का समय हो या दोपहर की तपन, बारिश हो या अंधेरा —
जहाँ ज़रूरत होती है, संटू दादा बिना बुलाए पहुँचे हैं।
ज़ुबान से नहीं, कर्मों से बोलती है उनकी इंसानियत
स्थानीय लोग उन्हें चलती फिरती एंबुलेंस कहते हैं।
एक बार ऐसे ही अवसर पर एक बुजुर्ग कहा: था कि
> "ऐसा बेटा हर गाँव को मिले, तो शायद दर्द की चीख़ें कभी बेसुनी न जाएँ।"
"उसने किसी का धर्म नहीं देखा, न जात — सिर्फ़ ज़ख़्म देखे और मलहम बन गया।"
एक सवाल समाज से भी...
यह घटना हमें आईना दिखाती है —
जब कोई तड़पता है, तो क्या हम भी रुकते हैं?
या हमारी गति हमें इंसान से मशीन बना चुकी है?
संटू दादा का यह क़दम हमें याद दिलाता है कि इंसानियत अभी ज़िंदा है — और जब-जब समाज चुप रहेगा, तब-तब कोई संटू दादा आगे बढ़कर बोलेगा, थामेगा और बचाएगा।विज्ञापन
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