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: जहां नि:स्वार्थ व निष्काम भावना होती है, वहां बंधन कभी नहीं टूटते

Barkat Qureshi / Thu, Jan 2, 2025 / Post views : 289

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जहां नि:स्वार्थ व निष्काम भावना होती है, वहां बंधन कभी नहीं टूटते - मयूर विहार कॉलोनी में आयोजित श्रीमद भागवत रस वर्षण के पहले दिन कथा वाचक धीरजकृष्ण शास्त्री (श्रीधाम वंदावन) ने कहा-   खंडवा(लोकेंद्र तिरोले)बगैर प्रेम की भक्ति कुछ दिन की होती है, उदाहरण के तौर पर जहां पानी पड़ा होता है, वहां चिकनाई होती है। जब ये पानी सुख जाता है, तब चिकनाई खत्म हो जाती है। इसी प्रकार प्रेम नि:स्वार्थ है, निश्काम है। जहां प्रेम हाेता है, वहां बंधन कभी नहीं टूटते हैं। लेकिन जहां स्वार्थ होता है, वह बंधन टूट जाता है। प्रेम मांगने की नहीं है, ये देय है। भागवत प्रेम है। ये बात श्रीमद भागवत ज्ञान गंगा यज्ञ महापर्व समिति के तत्वावधान में मयूर विहार में आयोजित श्रीमद भागवत रस वर्षण महोत्सव के पहले दिन गुरुवार को कथा वाचक धीरजकृष्ण शास्त्री (श्रीधाम वंृदावन) ने कही। कार्यक्रम प्रभारी आशीष जायसवाल ने बताया मुख्य यजमान ज्योति सतनामसिंह होरा ने भागवत पुराण की आरती कर धीरज कृष्ण शास्त्री जी को माला पहनाई। महाराज जी ने रस वर्षण पर कहा आज रस वर्षण महोत्सव का पहला दिन है, ये दिन इंट्रोडक्शन का दिन होता है। यानी जब बच्चा पहले दिन स्कूल अध्ययन के लिए जाता है, तो वह अपना नाम, पता सहित अपना इंट्रोडक्शन देता है, ठीक उसी प्रकार आज श्रीमद भागवत कथा का महात्म बताने का दिन है। जब हम बालक जिसे रुपए या किसी का ज्ञान न हो, तो उसे रुपए भी कागज का टूकड़ा लगेगा। लेकिन जब हम उसे उसका महत्व बताएंगे तो वह अपने पास सुरक्षित रखेगा। ठीक उसी प्रकार श्रीमद भागवत कथा का महत्व या महिमा बताई जाती है, ताकि वह सुरक्षित रहे। जब तक जानेंगे नहीं तब तक विश्वास नहीं होगा, और जब तक विश्वास नहीं होगा तब तक प्रेम नहीं होता है। हम कोई भी कार्य करते हैं तो उसका महात्म होता है। किसी मनुष्य का परिचय हम रूप, सार्म्थय व स्वभाव से देते हैं। भागवत सच्चिदानंद है, इसका अर्थ सत्-चित्-आनंद. यह परम अपरिवर्तनशील वास्तविकता के व्यक्तिपरक अनुभव का एक विशेषण और विवरण है। श्रीमद भागवत कथा श्रवण मात्र से भवसागर पार हो जाते है कथा वाचक ने कहा- श्रीमद भागवत के श्रवण मात्र से व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है। कथा के व्रण मात्र से ही व्यक्ति के पाप पुण्य में बदल जाते हैं। विचार में बदलाव होने पर व्यक्ति के आचरण में भी स्वयं बदलाव हो जाता है। उन्होंने श्रीमद भागवत कथा के महात्म व मंगलाचरण के प्रसंग सुनाते हुए कहा- सभी ग्रंथों का सार भागवत है। जिस जगह पर भागवत कथा का वाचन होता है। वह जगह तीर्थ स्थलों के सामान पवित्र हो जाती है। मनुष्य के निर्मल मन में भगवान का निवास होता है। मन में भगवान का निवास होने से इंसान बुनियादी सुख-सुविधाओं के साथ-साथ भक्ति मार्ग पर अग्रसर होता है। फ्रेंड्स कॉलोनी व मयूर विहार में हुआ स्वागत कथा वाचक धीरजकृष्ण शास्त्री (श्रीधाम वंृदावन)का कथा पंडाल में आने के पूर्व फ्रेंड्स कॉलोनी व मयूर विहार में घर-घर आरती व पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। कथा वाचक ने सबसे पहले मां भगवती व बाबा महाकाल के दर्शन किए। इस मौके पर आयाेजक गगनदीपसिंह होरा, अध्यक्ष जगदीश प्रसाद अग्रवाल, महासचिव रमाकांत पाराशर, चंद्रहास सोनी, माधव शांडिल्य, कीर्ति नीलकंठ, विक्रमसिंह यादव, एनके सोनी, बनवारी मालाकार, राकेश महाजन, हेमंत सोनी, हरभजनसिंह रघुवंशी, गोविंद गोस्वामी, भगवानदास पटेल, एमएल पटेल, विकास उपाध्याय, जगदीश प्रसाद सोनी, संतोष भावसार, मनोहर राजोरिया, विपिन उपाध्याय, दीपक श्रीमाली, केएन गंगराड़े, राजेंद्र पाल, राधेश्याम चंदौड़े आदि मौजूद रहे।

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