: नीरज परासर की कलम से
Barkat Qureshi / Fri, May 9, 2025 / Post views : 1410
जनाजा
कब तक सहते
मौन रहकर अत्याचार
एक सीमा के बाद
असहनीय हो जाता है
खामोश रहना...
तुमने तो हमें
कमजोर ही समझ लिया
लेकिन हमारी शक्ति
अंतर्मन में समाहित है
देश की एकता अखंडता
अक्षुण्य रखने के लिए
हम कोई भी कीमत
चुकाने को तैयार हैं...
जंग को तूने शुरू की थी
पर खत्म अब हम करेंगे
कर लेंगे हिसाब बराबर
बरसों से सुलगती आग का
अकेला खड़ा रहेगा तू
अपनों के जनाजे बनाने...
स्वरचित
नीरज पाराशर
कब तक सहते
मौन रहकर अत्याचार
एक सीमा के बाद
असहनीय हो जाता है
खामोश रहना...
तुमने तो हमें
कमजोर ही समझ लिया
लेकिन हमारी शक्ति
अंतर्मन में समाहित है
देश की एकता अखंडता
अक्षुण्य रखने के लिए
हम कोई भी कीमत
चुकाने को तैयार हैं...
जंग को तूने शुरू की थी
पर खत्म अब हम करेंगे
कर लेंगे हिसाब बराबर
बरसों से सुलगती आग का
अकेला खड़ा रहेगा तू
अपनों के जनाजे बनाने...
स्वरचित
नीरज पाराशरविज्ञापन
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