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: नीरज परासर की कलम से

Barkat Qureshi / Sun, May 11, 2025 / Post views : 977

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मातृऋण जब सब जगह से हम थककर चूर हो जाते हैं  हर तरफ हताशा के बादलो से घिर जाते हैं  मन विचलित हो जाता है कदम बरबस ही मां के आंचल की छांह तलाशते हैं...   जिसने हमें बोलना सिखाया चलना सिखाया दौड़ना सिखाया और हम चाहते हैं उससे दूर रहकर अपना परिवार कितने खुदगर्ज हैं हम पर उसे कोई शिकायत नहीं  सच में मां तो बस मां होती है...   नहीं देख पाती तकलीफ अपनी किसी भी औलाद की और झोंक देती है अपना सर्वस्व उसकी तकलीफ दूर करने में पर उसकी तकलीफें यथावत क्या हम चुका रहे हैं मातृऋण...?    नीरज पाराशर

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