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: हमें नेता नहीं, हमदर्द चाहिए” — मूंदी में कार्यकर्ताओं की हुंकार, कांग्रेस को चाहिए ज़मीन से निकला नेतृत्व

Barkat Qureshi / Wed, Jun 11, 2025 / Post views : 350

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हमें नेता नहीं, हमदर्द चाहिए” — मूंदी में कार्यकर्ताओं की हुंकार, कांग्रेस को चाहिए ज़मीन से निकला नेतृत्व ✍️ संवाददाता – इस्हाक़ गौरी, मूंदी कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान के तहत बुधवार को मूंदी स्थित राजपूत धर्मशाला में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में कार्यकर्ताओं ने पारंपरिक राजनीति से हटकर ज़मीनी नेतृत्व की खुलकर मांग की। सभा में एक स्वर में कहा गया — “हमें नेता नहीं, सहभागी चाहिए।” विचारों की रणभूमि बनी राजपूत धर्मशाला बैठक की अध्यक्षता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के सचिव एवं केंद्रीय पर्यवेक्षक श्री विजेंद्र प्रताप सिंह ने की। उनके साथ मंच पर वरिष्ठ नेत्री श्रीमती शोभा ओझा एवं क्षेत्रीय नेतृत्व से कुवर उत्तमपाल सिंह उपस्थित रहे। राजपूत धर्मशाला में जुटे कार्यकर्ताओं का जोश यह स्पष्ट कर रहा था कि कांग्रेस की जड़ें अब नए आत्मविश्वास के साथ गहराई में उतरना चाहती हैं। “यह आत्मा की पुकार है, सिर्फ़ ढांचा नहीं” — पर्यवेक्षक का ज़ोरदार संदेश पर्यवेक्षक श्री सिंह ने कहा, “यह केवल संगठनात्मक ढांचे का निर्माण नहीं, कांग्रेस की आत्मा की पुकार है। अब पद नहीं, संघर्ष की परीक्षा होगी। जो ज़मीन से जुड़ा होगा, वही नेतृत्व करेगा।” उनके इस बयान ने निचले स्तर पर काम कर रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं को गहरी प्रेरणा दी। सभा में मौजूद अधिकांश कार्यकर्ताओं ने पारदर्शी नेतृत्व प्रणाली की मांग दोहराई। गुलदस्ते नहीं, जमीनी मुद्दों पर संवाद बैठक में पारंपरिक स्वागत के साथ नेताओं को फूलमालाएं भेंट की गईं, लेकिन मंच से उठती आवाज़ों ने यह साफ़ कर दिया कि कांग्रेस कार्यकर्ता अब केवल रस्मों से संतुष्ट नहीं हैं। बूथ स्तर से लेकर महिला कांग्रेस, सेवा दल और एनएसयूआई के प्रतिनिधियों ने संगठनात्मक बदलाव की मांग करते हुए कहा, “हमें आदेश देने वाले नहीं, साथ चलने वाले नेता चाहिए।” ज़िला अध्यक्ष पद को लेकर कार्यकर्ताओं की खुली मांग बैठक के दौरान ज़िला अध्यक्ष पद को लेकर भी कार्यकर्ताओं की भावनाएं खुलकर सामने आईं। एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा, “हमने कांग्रेस को दिल से जिया है। अब हमें दफ्तरी नेता नहीं, वो साथी चाहिए जो संघर्षों में हमारे साथ चला हो।” पर्यवेक्षक श्री सिंह ने कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाया कि निर्णय अब ऊपर से नहीं, निचले स्तर की सिफ़ारिशों के आधार पर लिया जाएगा। “कांग्रेस खुद को हराती है” — शोभा ओझा का आत्ममंथन सभा के दौरान शोभा ओझा ने संगठन में व्याप्त आंतरिक खामियों पर बेबाक टिप्पणी करते हुए कहा, “कांग्रेस को भाजपा नहीं हराती, कांग्रेस को उसकी खुद की गुटबाज़ी और भीतरघात हराते हैं। जब किसी एक को टिकट मिलता है, तो चार अपने ही उसे हराने में जुट जाते हैं — और फिर हम हारते हैं ।” उनका बयान सभा में बैठे कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की तालियों के बीच गूंजता रहा। निष्कर्ष: अब नेतृत्व को उतरना होगा ज़मीन पर मूंदी से कांग्रेस संगठन को यह स्पष्ट संदेश गया कि कार्यकर्ता जाग चुका है। उसे अब दिशा देने वाला नेतृत्व चाहिए — वह भी ऐसा जो सत्ता से नहीं, संघर्ष से निकला हो। 🔸 “कांग्रेस को बचाना है, तो कांग्रेस को सुनना होगा।” 🔸 “नेता नहीं, सहभागी बनो – तभी कांग्रेस जिंदा रहेगी।”

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