: जंगल
Barkat Qureshi / Thu, Jun 5, 2025 / Post views : 783
जंगल
(विश्व पर्यावरण दिवस पर सादर समर्पित)
पता नहीं आजकल हम
किस ओर जा रहे हैं
प्रकृति की अनमोल धरोहर
दोनों हाथों से लुटा रहे हैं....
कभी सभी कुछ अच्छा था
आज सांस लेना भी दूभर है
जंगलों को उजाड़कर अब
जीना भी लगभग मुश्किल है...
दौलत की अंधी चाह में हम
बस भागे ही जा रहे हैं
सब कुछ तो अब उजड़ गया
सिर्फ बातें ही बना रहे हैं..
आगामी जीवन में यदि
अस्तित्व हमको रखना है
सहेजकर जंगलों को अब
जीवित हमें रखना है...
स्वरचित
(नीरज परासर की कलम से)
(नीरज परासर की कलम से)विज्ञापन
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