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: शक्कर तालाब किनारे चला बुलडोज़र – 137 मुस्लिम परिवारों के आशियाने जमींदोज रातों-रात उजड़ी बस्ती, प्रशासन ने अतिक्रमण बताया – स्थानीयों ने पक्षपात का आरोप लगाया

Barkat Qureshi / Thu, Jun 12, 2025 / Post views : 234

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शक्कर तालाब किनारे चला बुलडोज़र – 137 मुस्लिम परिवारों के आशियाने जमींदोज रातों-रात उजड़ी बस्ती, प्रशासन ने अतिक्रमण बताया – स्थानीयों ने पक्षपात का आरोप लगाया  (संवाददाता इस्हाक़ गौरी) शहर के हृदयस्थल माने जाने वाले शक्कर तालाब के किनारे गुरुवार तड़के 4 बजे नगर निगम व राजस्व विभाग की संयुक्त टीम भारी पुलिस बल के साथ पहुंची। प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करते हुए 137 मुस्लिम परिवारों के मकानों को ज़मींदोज़ कर दिया। इस दौरान 13 जेसीबी और 2 पोकलेन मशीनों का उपयोग किया गया, वहीं 400 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। 🛑 बिना सूचना, नींद में टूट गई ज़िंदगियाँ स्थानीय नागरिकों के अनुसार, बस्ती वर्षों से आबाद थी और अधिकांश परिवार छोटे-मोटे व्यवसाय, दिहाड़ी या मजदूरी से जीवन यापन कर रहे थे। गुरुवार तड़के जब लोग गहरी नींद में थे, तभी मशीनों की आवाज़ों और पुलिस के लाउडस्पीकरों से उनकी नींद टूटी। एक निवासी का दर्द भरा बयान – “अभी तो बराबर सुबह भी नहीं हुई थी, और हमारे घर पर कहर टूट पड़ा। बच्चे चीख रहे थे, और हम मलबे में अपना सामान तलाशते रह गए।”   ⚖️ प्रशासन का पक्ष – 'अतिक्रमण हटाया गया' अपर कलेक्टर श्री काशीराम बड़ौले ने बताया कि यह सभी मकान तालाब की ज़मीन और सरकारी भूमि पर बने अवैध निर्माण थे। कुल 137 मकानों पर कार्रवाई हुई, जिनमें से 22 मकानों को कोर्ट से स्टे होने के कारण छोड़ा गया। ये सभी मकान पूर्व में चिन्हित कर मार्क किए गए थे।   🚓 पुलिस का भारी बंदोबस्त एडिशनल एसपी महेंद्र तारणेकर ने बताया कि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए 400 पुलिस जवान और SFI की एक अतिरिक्त कंपनी तैनात की गई थी। क्षेत्र को सुरक्षा की दृष्टि से पूर्णतः नियंत्रित किया गया था।   🗣️ मुस्लिम समाज का आरोप – 'प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, साज़िश है' स्थानीय मुस्लिम नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस कार्रवाई को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका आरोप है कि प्रशासन ने एकतरफा रवैया अपनाया और केवल मुस्लिम बहुल बस्ती को ही निशाना बनाया।   एक स्थानीय जनप्रतिनिधि ने आरोप लगाया कि– “यह ज़मीनें कभी निजी स्वामित्व में थीं, जिन्हें रसूखदारों ने खरीदा। आज वही रसूखदार प्रशासन से मिलकर बस्ती को हटवा रहे हैं। यह अतिक्रमण नहीं, बल्कि समाज विशेष को टारगेट करने की सोची-समझी चाल है।”   ❓ अब सवाल ये हैं... क्या प्रशासन ने पुनर्वास की कोई योजना बनाई?   क्या रात के अंधेरे में बस्ती तोड़ना ज़रूरी था?   क्या यह कार्रवाई कानूनी दायरे में रहते हुए मानवीय मर्यादाओं के अनुसार हुई?   📌 अंत में... यह घटना न केवल एक बस्ती के उजड़ने की कहानी है, बल्कि यह व्यवस्था, न्याय और मानवीय संवेदनाओं की परीक्षा भी है। जब बुलडोज़र ज़मीन पर चलता है, तो उसका शोर सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं तोड़ता, ज़िंदगी की नींव भी हिला देता है।

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