"जब कलम बनी मशाल – क्राइम दर्पण का ऐतिहासिक पत्रकार सम्मान समारोह"
– रिपोर्टर इस्हाक गौरी, मूंदी
ये सिर्फ एक आयोजन नहीं था — ये एक अहसास था। एक सन्नाटा, जिसमें हर शब्द गरज बनकर गूंजा। एक मंच, जहां तामझाम नहीं, संघर्ष की कहानियां थीं। क्राइम दर्पण समाचार समूह और सबका साथ विजय के संयुक्त प्रयास से छत्रीपुरा स्थित माहेश्वरी स्कूल के विशाल डोम में ऐसा अद्भुत दृश्य रचा गया, जिसे पत्रकारिता का इतिहास हमेशा याद रखेगा।जब शब्दों से पहले भावनाएं आईं…भीड़ थी, लेकिन शोर नहीं। मंच था, लेकिन दिखावा नहीं।
यहाँ जुटे थे वो लोग, जिनकी कलम सत्ता से नहीं डरती, जो सच्चाई को ज़ुबान देते हैं।कार्यक्रम का सूत्र संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्री लोकेंद्र सिंह राठौर ने किया, और रचना का आधार बने निर्भीक पत्रकार श्री रऊफ खान, जिन्होंने पत्रकारों के लिए नहीं, पत्रकारिता के लिए यह क्रांतिकारी प्रयास किया।प्रबंध संपादक श्री संजय माहेश्वरी – लिए पत्रकारो ने कहा कि संजय महेश्वरी की उपस्थिति, किसी छांव की तरह पत्रकारों के साथ खड़ी रहती है।> "जब हम हिम्मत हारने लगे, तब संजय जी ने चुपचाप हमारी पीठ थपथपाई – यही सबसे बड़ा सम्बल था।"
जब हम पीछे देखते है तो संजय जी खडे नजर आते है यही विश्वास हमे मजबूती देता है। मुख्य अतिथि बोले – ‘ये सम्मान नहीं, ज़िम्मेदारी है’शहर काज़ी डॉ. इशरत अली काज़ी और डीएसपी उमाकांत चौधरी ने दो टूक कहा:> "पत्रकार वही जो सच के साथ खड़ा हो, चाहे तूफ़ान ही क्यों न हो।"
जब पत्रकार की कलम झुकती है तो केवल स्याही गिरती है ओर जब चलती है तब सच उभरता है।
उनकी बातों पर हाल में एक सन्नाटा छा गया — कुछ आंखें भीग उठीं, और कुछ दिल भर आए। सम्मान केवल प्रतीक नहीं था — वो जज़्बा थामंच पर बुलाए गए पत्रकारों के नामों के साथ जुड़ी थीं कहानियां — धमकियों की, बहिष्कार की, अपनों से दूर होने की।
लेकिन इन सबके बावजूद जो चीज़ नहीं टूटी — वो थी इनकी कलम।> "ये सिर्फ सम्मान समारोह नहीं था — ये संघर्ष का उत्सव था।" रऊफ खान — जिन्होंने आयोजन नहीं, आंदोलन खड़ा कियाउनकी बातें दिल से निकलीं और आत्मा तक पहुंचीं:> "हम वो लोग हैं जो रातों को जागते हैं, ताकि सुबह समाज को सच्चाई मिले।"
"ये मंच आपका है, और हमारी कलम — जनता की आवाज़ है।"उप महाप्रबंधक समीक्षा माहेश्वरी का वक्तव्य पूरे हॉल में गूंजता रहा:> "पत्रकार होना सिर्फ खबर देना नहीं, रोज़ खुद को कटघरे में खड़ा करना है।"
उनकी आवाज़ नहीं, उनके शब्दों का सच लोगों के रोंगटे खड़े कर गया।कार्यक्रम के सूत्रधार एवं क्राईम दर्पण के उप संपादक नौसाद खान ने कहा कि आयोजन का उददेेश्य है कि जनता को पता होना चाहिए कि सच्ची पत्रकारिता आज भी जीवित है।
और जब तक ऐसे लोग हैं जो डर के साए में भी सच लिखने का साहस रखते हैं — तब तक समाज को कोई अंधेरा निगल नहीं सकता।---उपस्थित रहे:मंजूर बैग, रियाज खान, महेश चौधरी, फैसल इब्राहिम, आई.पी.एस. यादव, नवनीत शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार कमलेश चौधरी, शब्बीर भाई, समीक्षा माहेश्वरी, आरिफ बरकाती, दुर्गा सूर्यवंशी, सोहेल पठान, सचिन तनेजा, रवि खरे, अजय असलकार, रोशनी तोषनीवाल, सलीम सोलंकी, अनामिका सीतलानी, पूजा चौहान, और पत्रकारिता से जुड़े अनेक नामचीन चेहरे।---अंत में...> "जब रऊफ खान ने आभार व्यक्त किया, तो शब्द रुक गए, लेकिन भावनाएं बहने लगीं।"
"आप सब हैं, तभी हम हैं। ये मंच आपका है, ये सम्मान आपका है – और कलम… वो हम सबकी जान है।"